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100. vijay - 2008-05-17 17:50:42 |
पत्रिका का कारपोरेट कम्युनिकेशन पर केंद्रित अंक पत्रिका के अन्य अंकों की अपेक्षा थोड़ा कमजोर लगा पर इस बात के लिए आपकी तारीफ करनी पड़ेगी कि आप हिंदी में वह विमर्श ला रहे हैं जो हिंदी जगत से अछूता था। पूर्व में निकला वेब मीडिया और रेडियो अंक आपकी उपलब्धि है।
विजय राधव, वाशी,
नवी मुंबई (महाराष्ट्र)
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99. yugesh - 2008-05-17 17:50:03 |
इन दिनों टीवी पत्रकारिता जिस प्रकार कभी-कभी समग्र पत्रकारिता की नीयत पर प्रश्चिन्ह लगवा रही है,वह चिंताजनक है। यदि पत्रकारिता से विश्वसनीयता घट गई तो बचेगा क्या? मीडिया विमर्श इन मुद्दों पर विमर्श कर रहा है यह महत्वपूर्ण है।
युगेश शर्मा, चूना भट्टी,
भोपाल, (मप्र)
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98. pawan - 2008-05-17 17:49:30 |
मीडिया विमर्श के सूचना का अधिकार अंक का अध्ययन किया। एक पत्रकार के रूप में मुझे इसका प्रकाशन बहुत ही अच्छा लगा। संपूर्ण सामग्री सामयिक होने के साथ-साथ पठनीय और संग्रहणीय भी है। यह पत्रिका जनमानस को नवचेतन की दिशा में उन्मुख करने में सफल होगी।
पवन कुमार अरविंद
संवाददाता; इंडिया दर्पण, नई दिल्ली
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97. sanjeev - 2008-05-17 17:48:58 |
आपका सजग संपादक पत्रिका की हर रचना और हर पृष्ठ पर अपनी दक्षता की छाप छोड़ता है। सामयिक विषयों का चयन, अधिकारी लेखकों के द्वारा व्यवस्थित, प्रामाणिक, निष्पक्ष विवेचन,सहज भाषा शैली, सुरूचि पूर्ण रेखांकन,सम्यक पृष्ठ साा- हर निकष पर पत्रिका ने शैशव में ही परिपक्वता पायी है।
संजीव वर्मा सलिल, संपादक;नर्मदा, नेपियर टाउन, जबलपुर(मप्र)
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96. ganesh - 2008-05-17 17:48:35 |
मीडिया विमर्श के माध्यम से आप वर्तमान की एक बड़ी आवश्यकता की पूर्ति कर रहे हैं। वेब पत्रकारिता पर पत्रिका का विशेषांक एक संग्रहणीय अंक बन पड़ा है। श्री कृष्णचंद्र मौलि का यह कथन यथार्थ के अत्यंत निकट है कि परंपरागत पत्रकारिता और वेब पत्रकारिता परस्पर विरोधी नहीं वरन एक-दूसरे के पूरक हैं। अन्य आलेख भी ज्ञानवर्धक एवं उपयोगी हैं। ऐसी उत्तम प्रस्तुति के लिए बधाई।
डा. गणेशदत्त सारस्वत
संपादक; मानस चंदन, सिविल लाइंस, सीतापुर (उप्र)
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95. dinesh - 2008-05-17 17:48:03 |
पत्रिका के ताजा अंक में श्री मनहर चौहान का संस्मरण पढक़र अच्छा लगा। ऐसे यशस्वी पत्रकारों से आप परिचित करा रहे हैं, यह बड़ी बात है। पत्रिका में कारपोरेट कम्युनिकेशन पर बेहतर सामग्री आपने दी है। यह अंक फिर से संग्रहणीय बन
गया है।
दिनेश प्रसाद दुबे, पत्रकार; दैनिक हिंदुस्तान, गांधी नगर,
बस्ती-272001 (उप्र)
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94. rachna - 2008-05-17 17:47:32 |
पत्रिका का हर अंक एक नई रोशनी लेकर आता है। अहा जिंदगी के बाद यह हाल के दौर की दूसरी पत्रिका है जिसने मुझे प्रभावित किया।
यह पत्रकारिता के क्षेत्र में एक नई धारा है जिसे आपने पहचाना और अंजाम दिया। हालांकि पत्रकार जगत में उनकी पेशेगत मजबूरियों के चलते नियमित पठन-पाठन संभव नहीं होता पर यदि वे मात्र यह पत्रिका ही पढ़ें तो भी उन्हें काफी मानसिक खुराक मिल जाएगी।
रचना वर्मा, एम पी नगर,
भोपाल (मप्र)
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93. डा.रू& - 2008-04-24 20:40:05 |
| बहुत दिनो से ऐसे क्षेत्रों में रहा जिधर इंटरनेट तो दूर पीने के पानी तक की समस्या अब तक मुंह फाड़े खड़ी रहती है। सत्प्रयासों के लिये साधुवाद स्वीकारिये.... |
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92. - 2008-04-16 17:33:11 |
मीडिया विमर्श का रेडियो की वापसी पर केंद्रित अंक अपने आप में एक मुकम्मल किताब है। अंक में सभी लेखकों के आलेख प्रभावित करते हैं। प्रभु जोशी का लेख भी आंखें खोल देने वाला है। अष्टभुजा शुक्ल जी का स्तंभ हमेशा की तरह अपनी भाषा और संदेश से प्रभावित करता है। ऐसे लेखकों को पढ़कर अच्छा लगता है।
- विजय श्रीवास्तव
शाहपुरा, भोपाल (मध्यप्रदेश)
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91. - 2008-04-16 17:32:48 |
रेडियो की वापसी पर केंद्रित अंक कई मायनों में अनूठा और संग्रहणीय है। पत्रिकाएं अक्सर विशेषांक के रूप में आती है और अचर्चित रह जाती हैं। असल में विशेषांक की सामग्री ही ऐसी नहीं होती जो हमारा ध्यान आकृष्ट करे, वैचारिक हस्तक्षेप कर सके। आपने इस पहलू का ध्यान रखा है। यह सुखद संयोग है। पत्रिका के प्रारंभ में संदेशों की भरमार है इसे आगे या पीछे फैलाया जा सकता था। इतनी अच्छी सामग्री के प्रारंभ में इतने ज्यादा शुभकामना संदेश के प्रभाव को कम करते हैं। अष्टभुजा शुक्ल का इत्यलम् जो शीर्षक देता है ’’ज्यादा घातक है आज का साम्राज्यवाद’’ उस पर इस लेख में कोई (विशेष) चर्चा नहीं है। यहां साम्राज्यवाद की जगह जाति-वर्णवाद हो सकता था। लेख पठनीय है, मननीय है।
- बजरंग बिहारी तिवारी
204, दूसरी मंजिल, टी-1341, बेगमपुर, मालवीय नगर, नई दिल्ली-110017
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